सम्राट अशोक का मोह भंग अस्ताचल को गया था दिवाकर ; था विराजमान नभ में निशाकर । झिलमिला रहे थे सितारे ; दीपों की लगी थी कतारें । फहरा रही…
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स्वरचित कविता का प्रकाशन
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