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अरज है शारदा से
हे श्वेतपुंज ! हे शारदा!
सुन लो विनय हमारी,
हम दीन-हीन है पातकी
तू पाप पुंज हारी।
अब खोल दो माँ कमल नयन
वरदान दे दो ज्ञान का,
ज्ञान का दीपक जलाऊँ
भाव रक्खूँ दान का।
संत की सेवा करूँ
सज्जन का हरदम साथ हो,
न कभी हृदय में हो अहम्
बस लोकहित की बात हो।
हे शारदा तु है जहाँ
नहीं लोभ, मोह, नं दंभ है,
है धैर्य और सहिष्णुता
जहाँ ज्ञान का स्तंभ है।
यश कीर्ति के भागी बने
सत्मार्ग हमको दिखाए रखना;
इस लिए वीणा धारिणी
अपनी ही धुन में चलाए रखना,
स्पर्श है तेरे चरण
अपनी कृपा बनाए रखना।
RAGINI KUMARI


