“एक दिन का सम्मान या हमेशा?”
“मैं शिक्षक हूँ — और यह मेरी कहानी है”
मैं शिक्षक हूँ…
हाँ, वही —
जो सुबह पहले विद्यालय पहुँचता है
और अंत में ताला लगने पर लौटता है।
मेरी कोई बड़ी अभिलाषा नहीं थी,
बस एक जिद थी —
मेरे बच्चे मुझसे आगे निकलें।
मैंने अपने सपनों को
उनकी आँखों में बसाया,
अपनी थकान को
उनकी मुस्कान में छिपाया।
लोग कहते हैं —
“आप तो बहुत जुनूनी हैं।”
हाँ, हूँ…
क्योंकि मैंने ठान लिया था
कि बच्चों के लिए जीना है,
जरूरत पड़े तो
उनके लिए मर भी जाना है।
जब विद्यालय ने सराहा,
मैं मुस्कराया।
जब प्रखंड ने सम्मान दिया,
मैंने उसे बच्चों को समर्पित कर दिया।
जब जिला और राज्य मंच पर
मुझे बुलाया गया और
राजकीय शिक्षक सम्मान 2025 मिला,
तो लगा —
मेरे संघर्षों को पहचान मिल गई।
पर सच कहूँ?
पुरस्कार के बाद
फोन की घंटियाँ धीरे-धीरे बंद हो गईं।
तस्वीरें दीवार पर टँग गईं,
और मैं फिर उसी ब्लैकबोर्ड के सामने खड़ा रह गया।
किसी ने नहीं पूछा —
“विवेक, अब आगे क्या?”
किसी ने नहीं जाना —
कि कितनी रातें मैंने योजनाएँ बनाते बिताईं,
कितनी बार असफलताओं ने मुझे तोड़ा,
कितनी बार मैंने अकेले ही
पूरे सिस्टम से लड़कर
अपने बच्चों के लिए रास्ता बनाया।
मैं शिकायत नहीं करता,
पर सवाल जरूर करता हूँ —
क्या शिक्षक का सम्मान
सिर्फ एक दिन का उत्सव है?
क्या उसकी मेहनत
सिर्फ एक प्रमाण-पत्र में सिमट जाती है?
मैं आज भी वहीं हूँ —
उसी विद्यालय में,
उसी चॉक की धूल में,
उसी उम्मीद के साथ।
क्योंकि मेरा मकसद
मंच नहीं है…
मेरा मकसद
मेरे बच्चे हैं।
अगर मेरे संघर्ष भुला दिए जाएँ,
तो भी मुझे संतोष है —
क्योंकि मेरी असली पहचान
किसी ट्रॉफी में नहीं,
उन विद्यार्थियों की सफलता में है
जो एक दिन कहेंगे —
“हमारे सर ने हमें हारना नहीं सिखाया।”
और शायद…
यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
विवेक कुमार
भोला सिंह उच्च माध्यमिक, विद्यालय, पुरुषोत्तमपुर,
कुढ़नी, मुजफ्फरपुर
विवेक कुमार

