लड़खड़ाती जिंदगी यह, आज भी है चल रहीं।
सामने है काल तो क्या, काल को भी खल रही।।
हौसलों को देख मेरे, दंग रह जाते सभी।
सोचते हैं बस हमेशा, वक्त कितना छल रही।।
दौड़ उनके पास जाता, ज्यों बुलाया हो तभी।
मानते बेकार मुझको, बात इतनी सल रही।।
भीड़ का हिस्सा बनूँ मैं, है मुझे मंजूर कब।
था अकेला चल दिया मैं, राह खुद अब ढल रही।।
मानता हूँ पास मेरे, है नहीं दौलत बड़ी।
प्रेम पथ पर चल पड़ा हूँ, भावना बस गल रही।।
पा सका मंजिल कहाँ हूँ, पर बना राही रहा।
देखकर बस चाल मेरी, हाथ दुनिया मल रही।।
सैकड़ों थें प्रश्न पाले, छोड़ उनको चल दिया।
और दुनिया ढूँढती बस, प्रश्न के कुछ हल रही।।
रचयिता:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
प्राथमिक विद्यालय कालीगंज उत्तर टोला
बिहटा, पटना, बिहार।
संपर्क – 9835232978
