कविता
मेरे सपनों का गाँव
सहज सुभग शाश्वत विहान हो।
मधु खग-कलरव, दिव्य आख्यान हो।
जन-जन में बसे प्रबुद्ध ज्ञान हो।
हो प्राकट्य जब प्रथम किरण का,
विकास के लय में चल पड़े पाँव।
ऐसा हो मेरे सपनों का गाँव ।
रोगमुक्त, आत्मनिर्भर, श्रमशुभंकर, विद्वान हो।
शीलगुण सम्पन्न, प्रेमपूरित हृदय वितान हो।
नारी-रक्षा परम धर्म इनका उचित स्थान हो।
हो नित्य नवीन सृजन चहुँओर,
मानस को मिले ऐसे आदर्शों की छाँव ।
ऐसा हो मेरे सपनों का गाँव ।
चैतन्य तन मन में ओज का भान हो।
ग्राम श्री-लावण्य से नगर समान हो।
क्षुधा अन्नपूरित ओ शुद्ध सलिल का पान हो।
श्रम के सारथी जब सांझ को आये,
मिले उन्हें सूकून की ठाँव।
ऐसा हो मेरे सपनों का गाँव ।
विकास कुमार साव
प्रधान शिक्षक
प्राथमिक विद्यालय चांदौडीह
बेलहर बांका
VIKAS KUMAR SAW

