पद्यपंकज Prem,sandeshparak चल लौट चलेंं-लवली कुमारी

चल लौट चलेंं-लवली कुमारी


Lovely kumari

लेख सुनें तैयार

चल लौट चलें

चल लौट चलें
अब गांव की ओर
वो मिट्टी की सोंधी
सोंधी सी खुशबू
वो सरसों की बालि
खेतों में लहराए
फिर इठलाती हुई
पक्षियों की पाँखें
मानो जैसे हवा में
फैला रहा सौरभ
चल लौट चलें
अब गांव की ओर
वो बागों की झूले
जहां हम बचपन में खेले
पक्के आमों की सुबास
वो पनघट की मेले
जहां छम-छमाती
पायल की झंकारे
कब से तड़पा रही
ये आस
चल लौट चलें
अब गांव की ओर
वो कोयल की
प्यारी-प्यारी कूक
वो मां के हाथों की
मक्के की रोटी
वो मास्टर जी की
लंबी लाठी
वो रेलगाड़ी की
सीटी की छुक-छुक
राह देखती मेरी
अनपढ़ मिट्टी
चल लौट चले
अब गांव की ओर।

लवली कुमारी
उत्क्रमित मध्य विद्यालय अनूप
बारसोई कटिहार

1 Likes
Spread the love

Leave a Reply