दोहे
श्री निवास घर में करें, जब तक मिलता मान।
अहंकार के जागते, कर जाती प्रस्थान।।
श्री पाकर सेवा करें, करिए कुछ उपकार।
यही सीख श्री दे रही, करें जगत स्वीकार।।
श्री नारायण की प्रिया, जहाँ बसे हैं संग।
पुलकित रहता वह धरा, भरकर नवल उमंग।।
श्री आकर्षण घात कर, भटकाती है राह।
नारायण के संग में, पूर्ण करें सब चाह।।
श्री जग का आधार हैं, “पाठक” सत्य विचार।
प्रभु पग करता वंदना, समरस रख व्यवहार।। :- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)
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