बसंत -डॉ अजय कुमार

Ajay

बसंत

आम के पेड़ पर छाए बौड़़
चर- अचर नाचें चहूँ ओर
सुरभित भए दिग- दिगंत
सखि, यही तो है बसंत!
रे अलि! आया बसंत!

सिसिर का सुनापन है भागा
वन उपवन में जीवन जागा
फाग राग गाने लगे संत
सखि,यही तो है बसंत!
रे अलि! आया बसंत!

गेंदा,डालिया धरती चूमी
महुआ महका,सरसों झूमी
दसों दिशाएं हुई जीवंत
सखि, यही तो है बसंत!
रे अलि! आया बसंत!

जीवंतता का जारी रहे नर्तन
न हो सुमधुर भावों का अंत
मन बसें रहें सदा कंत
सखि, यही तो है बसंत!
रे अलि! आया बसंत!
✍️डॉ०अजय कुमार”मीत”

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