मन चंगा तो कठौती गंगा-मनु कुमारी

Manu Raman Chetna

एक साधारण गृह से उठी,

चेतना की दिव्य ज्वाला।

रविदास ने कर्म से तोड़ा,

रूढ़ि-बंधन का हर ताला।

न मंदिर की सीढ़ी ऊँची,

न तीर्थों का आडंबर भारी,

मन की निर्मलता में देखी

उन्होंने ईश्वर की तैयारी।

“मन चंगा तो कठौती गंगा”

बस इतना सा ज्ञान दिया।

भीतर की पवित्रता को ही,

मोक्ष का प्रथम विधान किया।

भक्ति वहाँ प्रदर्शन नहीं थी,

श्रम ही उनका साधन था।

जहाँ हाथों में पसीना हो,

वहीँ उनका सच्चा वंदन था।

मीरा की वीणा में गूँजे,

रविदास तुम्हारा नाम।

निर्गुण धारा के उजले दीप,

पीड़ित मन का बने मुकाम।

समता, करुणा, आत्मसम्मान,

थे जीवन के सूत्र महान।

मानव-मानव एक है—

यही था उनका उद्घोष प्रमाण।

आज भी जब दुनिया बाँटे,

नाम, जाति, ऊँच-नीच।

रविदास! तुम याद दिलाते,

इंसानियत की सच्ची सीख।

तुम मंदिर नहीं, मूर्ति नहीं,

न किसी ग्रंथ की सीमा।

तुम हर उस मन में बसते हो,

जहाँ जीवित है करुणा की रीमा।

स्वरचित एवं मौलिक 

 मनु कुमारी, विशिष्ट शिक्षिका

प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी, राघोपुर,सुपौल

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