मानवता- राम किशोर पाठक 

Ram Kishore Pathak

ज्ञानी जन चिंतन करें, मानव कर्म विमर्श।

कुंठित मानवता हुई, कैसे हो शुभ दर्श।।

कैसे हो शुभ दर्श, वर्ष नव आस जगाए।

माता का आशीष, नवल अब पथ दिखलाए।।

झेल रहे सब दंश, नहीं माने अभिमानी।

माता से अब अर्ज, देख लो करते ज्ञानी।।०१।।

मानव-मानव का बना, देखो दुश्मन आज।

अहं भाव रख कर रहा, अपना सारा काज।।

अपना सारा काज, स्वार्थ के कारण करता।

जाए कहीं समाज, उसे क्या अंतर पड़ता।।

मातु शैलजा आज, बने हैं सारे दानव।

दे दो तुम आशीष, रखे मानवता मानव।।०२।।

नव संवत्सर में खिले, मानवता के फूल।

आओ माता के शरण, हरण करे जो शूल।।

हरण करे जो शूल, वर्ष नव मंगल कारी।

वरद शैलजा हस्त, सौम्य शुभ वृषभ सवारी।।

मानवता का भाव, बहे हर चित में निर्झर।

रखकर यह विश्वास, शुभद हो नव संवत्सर।।

रचनाकार:- राम किशोर पाठक 

प्रधान शिक्षक 

सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।

संपर्क- 9835232978

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