मैं सागर से भी गहरा हूँ
तुम कितने पत्थर फेंकोगे ?
चुन-चुनकर सारे पत्थर को
मैं नई डगर बनाऊंगा,
नित-नए कदम बढ़ाऊँगा,
बढ़ता ही चला जाऊंगा।
बोलो मेरी राहों में,
तुम कितने कांटे बोओगे?
समय की लम्बी दौड़ में,
मैं ऐसी दौड़ लगाऊंगा,
अपनी तेज़ रफ्तार से,
समय को भी हराऊंगा।
मिटा सको तो मिटा दो,
मेरे कदमों के निशानों को,
मैं समंदर चीर के निकला हूँ,
हैरान कर दूँ ज़मानों को,
हारना तो मैं सीखा नहीं,
तुम कभी हरा न पाओगे।
मैं वो चिराग़ हूँ राहों का,
जो आंधियों में भी मुस्काएगा,
तुम चाहे जितनी ज़ोर लगाओ,
तुम चाहे जितनी कोशिश कर लो,
मैं खड़ा हिमालय जैसा हूँ,
तुम मुझे हिला न पाओगे,
तुम मुझे हिला न पाओगे।
रचयिता – मोहम्मद आसिफ इकबाल
विशिष्ट शिक्षक
राजकीय बुनियादी विद्यालय उलाव बेगूसराय बिहार।
