दिवाली में सजाकर गाँव की गलियाँ करें रौशन दिवाली में। सजा दो फूल की लड़ियाँ लगे उपवन दिवाली में।। बताना आज है सबको तिमिर फैला घनेरा है। मिटाना है हमें…
दीपक के कई रूप रत्ना प्रिया
दीपक के कई रूप एक दीप, आशा की किरण, निराश मन की आशा | एक ज्योति, उज्ज्वल दृष्टि, नयनों की ज्योति | एक दीपक, बुढ़ापे की लाठी, कुल की कीर्ति…
मीठी बोली- रामपाल प्रसाद सिंह
मीठी बोली। कोयल के लिए स्वर,अनमोल सरोवर, डूबने को हर लोग,चाहते हैं दिन-रात। काक काला लिए रंग,कंठस्थ है स्वरभंग, करते बच्चों को तंग,निर्दयी पक्षी की जात। आचार-विचार से ही,पहचान मिलती…
वंदनवार सजे शारदा – रामपाल प्रसाद सिंह
वंदनवार सजे शारदा शोर हुआ अब कानन में। मदिरा सवैया भोर हुई उठ जा प्रिय जीवन, बोल रही कोयल वन में। स्वप्न निरंतर देख रही तुम, शोर हुआ अब कानन…
रामायण पढ़ते हैं – राम किशोर पाठक
गीतआओ चिंतन कर लें थोड़ा, जो खुद गढ़ते हैं।गाथा सुंदर रामायण की, हम-सब पढ़ते हैं।। आओ चिंतन कर लें थोड़ा, जो खुद गढ़ते हैं।गाथा सुंदर रामायण की, हम-सब पढ़ते हैं।।…
मेरी पोषण वाली थाली – अवधेश कुमार
मेरी पोषण वाली थाली : बाल कवितामाँ ने सजाये थाली में अनोखे रंग ,पोषण थाली अब करेगी कुपोषण से जंग । मोटे अनाज देंगे हमें बल,गेहूँ, चावल भरें संबल। दाल…
कैसे कह दूं – बैकुंठ बिहारी
कैसे कह दूंकैसे कह दूं कि सब ठीक है,अजीब सी बेचैनी है।कैसे कह दूं कि सब ठीक है,अजीब सा अधूरापन है।कैसे कह दूं कि सब ठीक है,अजीब सी दुविधा है।कैसे…
रामायण – राम किशोर पाठक
आओ चिंतन कर लें थोड़ा, जो खुद गढ़ते हैं। गाथा सुंदर रामायण की, हम-सब पढ़ते हैं।। नारायण होकर जब नर सा, विपदा झेला है। फिर क्यों रोते रहते हम-सब, दुख…
यूँ ही लम्हें बीत जाएँगे – अमरनाथ त्रिवेदी
यूँ ही लम्हें बीत जाएँगे , न हम रहेंगे न तुम रहोगे फिर अपनी बात कहाँ और किसको कहोगे ? यह अंतहीन सिलसिला चलता ही जाएगा । क्या यह कभी कहीं रुक भी…
हेलो अक्टूबर अवधेश कुमार
हेलो अक्टूबर : मेरे बगीचे से : बाल कविता अक्टूबर आया लेकर मौसम सुहाना सा, सूरज मृदु , नभ नीला शांत सा । मेरे बगीचे में खिले हैं तरह तरह…