अब भी यूं रुका क्यों है -डॉ स्नेहलता द्विवेदी

तू अब भी यूँ रुका क्यूँ है? गुलाब कांटों से यूँ लगा क्यूँ है ? जिंदगी तेरा ये फ़लसफ़ा क्यूँ है? जो मुस्कराते हो शबनम की तरह, पलकों का रंग…

पेड़- गिरीन्द्र मोहन झा

पेड़ बीज को अंकुरित होने में भी लगता है संघर्ष, पौधे धीरे-धीरे बढ़कर हो जाते हैं पेड़, यह पतझड़-वसंत-ग्रीष्म-वृष्टि-शीत, सबको सहता है, सबका आनंद लेता है, उचित समय के अनुसार,…

हिंदी भाषा की गरिमा – राम किशोर पाठक

हिंदी भाषा की गरिमा को, उच्च शिखर पहुँचाना होगा। हिंदी के प्रति जन-मानस में, प्रेम अटूट जगाना होगा।। रामचरित रचकर तुलसी मान बढ़ाएँ। हिंदी भाषा की गरिमा को अपनाएँ।। घर-घर…

निःशब्द सौंदर्य – बिंदु अग्रवाल

वह अनुपम अद्वितीय यौवना सिर पर पत्थरों का भार लिए एक हाथ से अपने आँचल को संभालती। हिरनी सी सजल आँखे उसकी विवशता को दर्शाती, सजने सँवरने के दिन, नैन…

विश्वकर्मा पूजा – राम किशोर पाठक

सौर वर्ष में करते गणना। भाद्र शुक्ल शिल्पी का गहना। सदा प्रतिपदा शुभता लाती। कन्या राशि संक्रांति आती।। नियत समय हर वर्षो से हीं। विश्वकर्मा पूजन सदा हीं।। सतरह तारीख…