दोहे
सकल सृष्टि में कर्म के, फल का बना विधान।
जिसका पालन का सदा, रखते शनि हैं ध्यान।।
जिसने जैसा है किया, उसे वही हो प्राप्त।
न्याय व्यवस्था शनि किए, सारे जग में व्याप्त।।
पिता सूर्य से रूष्ट शनि, दिखलाते हैं क्रोध।
माता छाया के लिए, पाकर करुणा बोध।।
शोभित वाहन गिद्ध की, कर में लिए त्रिशूल।
कहते जग को चेत जा, करने से तू भूल।।
सदा दृष्टि शनि देव जी, मुझपर रखिए शांत।
“पाठक” विनती कर रहा, बनें नहीं आक्रांत।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)
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