जलती दुनिया आग में- प्रदीप छंद गीत
धरा एक ही सबका प्यारा, बँटें भले भूभाग में।
ध्वंस मचाते युद्ध कही भी, जलती दुनिया आग में।।
अहंकार में गोले दागे, दुश्मन सबको मान के।
समय उसे भी सिखलाता है, लाले पड़ते जान के।।
पर इसमें निर्दोषों की भी, हत्या होती झाग में।
ध्वंस मचाते युद्ध कही भी, जलती दुनिया आग में।।०१।।
त्याग दिए हैं मानवता को, बनते बस बलवान जो।
भाईचारा वसुंधरा की, भूल बुद्ध का ज्ञान जो।।
बस दिखता है भय फैलाना, उनके सारे राग में।
ध्वंस मचाते युद्ध कही भी, जलती दुनिया आग में।।०२।।
घर जब जलता दूजे का है, धुआँ मिले निज गेह से।
जीवन का हर सार छुपा है, रहना सबसे नेह से।।
बच पाना मुमकिन लगता बस, सद् प्रज्ञा के जाग में।
ध्वंस मचाते युद्ध कही भी, जलती दुनिया आग में।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क- ९८३५२३२९७८

