प्रकट हो माता भवानी रामपाल प्रसाद सिंह

RAMPAL SINGH ANJAN

कुंडलिया
प्रकट हो मात भवानी। (दुर्गा/पार्वती)

मात भवानी प्रेरणा,शक्ति पुंज आधार।
धरा अकारण मानती,तेरा ही उपकार।।

तेरा ही उपकार,सघन हरियाली छाई।
संकट में संसार,आप ही सम्मुख आई।।

कहते हैं”अनजान”,अमिट है कथित कहानी।
गिरि सम गोचर पाप,प्रकट हो मात भवानी।।

वाणी माता (सरस्वती)

माता वाणी प्रेरणा,जीवन निखिल प्रभात।
रेख रोशनी आ रही,छोड़ी ठंड बिसात।।

छोड़ी ठंड बिसात,जगत निर्भयता छाई।
उल्लासित है आज,कलि जो थी मुरझाई।।

स्वागत नवल प्रभात,द्वार पर जग कल्याणी।
तमस गया है भाग,प्रकट भव माता वाणी।।

हे माता! जगतारणी

हे माता! जगतारणी,जाना है भवपार।
थाल लिए द्वारे खड़ा,कर ले तू स्वीकार।।

कर ले तू स्वीकार,हृदय मेरे में छपना।
चरणों के ही पास,जगह दे गज भर अपना।।

जुड़वा लें”अनजान”,चरण धूली से नाता।
पापी अर्जित पाप,मिटाने आई माता।।

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
मध्य विद्यालय दरवेभदौर प्रखंड पंडारक पटना
ओम नमः शिवाय

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