खिचड़ी -रामपाल प्रसाद

खिचड़ी

खिचड़ी मन में पक रही,बिना किसी आधार।
घर में पकती आज तो,बहती है रसधार।।

बहती है रसधार,आज का दिन है पावन।
लटती मस्त पतंग,गगन में लगे लुभावन।।

व्यंजन दिखते थाल,भावना सुखमय निखरी।।
मगन हुए”अनजान”,खिलाकर खाई खिचड़ी।

खिचड़ी पर्व महान है,मन में भरे उमंग।
एक मास खरमास की,निद्रा करती भंग।।

निद्रा करती भंग,भागती गंगा सागर।
पकड़ी है रफ्तार,पीठ पर जाते नागर।।

पुण्यलोक में आज,हुई है ऊॅंची पगड़ी। 
मत चूको”अनजान”,खिलाओ खाओ खिचड़ी।।

चूड़ा तिलकुट दुग्ध में,दही करें संवाद।
छप्पन भोगी देवता,करते आज निनाद।।

करते आज निनाद,बड़ी है इसकी महिमा।
पुलक रही है आज,सभी की भाव-भंगिमा।।

गया दिवस खरमास,नहीं है मन में कूड़ा।
हर्षित है “अनजान”,मिला खाने को चूड़ा।।

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’ 
मध्य विद्यालय दरवेभदौर
पंडारक पटना
ओम नमः शिवाय

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