Wo bihar wala bachpan



1000441787.jpg

​वो बिहार वाला बचपन

​पीपल की छइयाँ, बगिया की वो क्यारी,

वो अमरुद तोड़ना, वो मज़ेदारी।

याद आता है वो बिहार वाला बचपन,

सत्तू का शरबत और माँ का आँगन।

​नंगे पाँव मिट्टी में वो दौड़ लगाना,

पकड़म-पकड़ाई में सारा दिन बिताना।

गंगा किनारे वो रेत के घरौंदे,

वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश के बूंदें।

​लिट्टी-चोखा की सोंधी सी खुशबू,

दादी की कहानियों का अनोखा जादू।

लालटेन की रोशनी में वो पहाड़े रटना,

बिजली कटने पर छत पे वो लेटना।

​छठ की वो रौनक, वो ठेकुआ का स्वाद,

घाटों के मेले, सब आते हैं याद।

साइकिल के टायर को डंडे से भगाना,

भरे दुपहरी में वो आम चुराना।

​बड़े हो गए हम, पर वो सुकून खो गया,

शहर की भीड़ में मासूमियत सो गया।

काश! मिल जाए फिर से वही गलियाँ,

वही बचपन का खिलना, वही हँसती कलियाँ।

0 Likes

Barun Kumar

Spread the love

Leave a Reply