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आँचल मैं भर लूँ
मैं सावित्री बन ईश्वर से ,
पिय प्राण वरण कर लूँ।
मैं काल के नियमों को भी,
प्रण से ,आज शमन कर लूँ।
मैं अपने साहस तपबल से ,
विधि काल चक्र बदलूँ।
इस अगणित वैभव को भी ,
मैं तो , पल प्रतिपल तज दूँ।
पिय का संग अहर्निश पाऊँ,
वट पूजन कर लूँ।
सुना है कि यमराज भी हारे,
मैं तप वो कर लूँ।
सदा सुहागन बनी रहूँ मैं,
मन सुन्दर कर लूँ।
घर आँगन बस प्रेम हमेशा,
आँचल मैं भर लूँ।
डॉ स्नेहलता द्विवेदी’आर्या’
उत्क्रमित कन्या मध्य विद्यालय शरीफगंज,कटिहार

