बचपन
ना ही किसी की फिक्र है, ना ही किसी का जिक्र हैं,
करते हरदम अपने मन की, यही उमर हैं बचपन की।
तुरंत रूठना तुरंत मान जाना, लड़ना झगड़ना ओर मनाना,
किसी बात को नहीं दिल से लगाते, यह वो फ़रिश्ते है, जो रोते हुए को भी हँसाते।
करते हरदम अपने मन की, यही उमर है बचपन की।
रब दिखता है इनकी सूरत में, खुश रहते हैं हर हालत में,
ना ही किसी से दोस्ती, ना ही किसी से बैर मन चाही चीजें न मिले तो होती नहीं है खैर।
निडरता, निर्भीकता, बहादुरी है इनकी पहचान,
इनसे शिक्षा ले सकता हैं दुनिया का हर इंसान।
करते हरदम आपने मन की यही उमर है बचपन की।
ना ही किसी का फिक्र है, ना ही किसी का जिक्र हैं
यही उमर हैं बचपन की _
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Mamta tiwari

