मौन का क्रंदन: कब तक खामोश रहेंगे हम?यह कैसी चुप्पी साध रखी है, होठों पर कैसा पहरा है?
झंझावातों से घिरा हुआ, यह सन्नाटा बेहद गहरा है।
जब कंठ खुला है ईश्वर का दिया, तो कुछ तो सुर खोल सकते हैं,
अन्याय देख जो काँप उठे, वो दो शब्द तो बोल सकते हैं!चारों ओर लगी है आग विकट, झुलस रहा हर कोना है,
मजबूर खड़ा है इंसान यहाँ, नियति का बस रोना है।
जो बिखरा है बारूद यहाँ, उसे क्यों नहीं रोक सकते हैं?
हम अपनी आँखों के आगे, ये कुरुक्षेत्र क्यों होने देते हैं?
इतनी सी बात समझने में, बुद्धि पर कैसा ताला है?
जिस सोच से जीवन महक उठे, उस सोच को क्यों दे निकाला है?
तर्क-वितर्क की शक्तियों को, हम कहाँ गंवाकर बैठे हैं?
सच्चाई को अपनाने से, हम क्यों मुँह मोड़कर बैठे हैं?
देखो! मानव के जीवन का, कैसा निर्मम ह्रास हुआ,
जो रक्षक था इस धरती का, वही आज विनाश हुआ।
सपनों की अर्थी उठती है, साँसों का सौदा होता है,
इंसानियत के इस मरुस्थल में, अब कोई न आँसू बोता है।
मानव अपनी ही माया में, अपनी मानवता खो बैठा,
निर्मोही, निष्ठुर, अंधा बन, वह पाप की गगरी ढो बैठा।
इतने गुमसुम, इतने लाचार, हम कैसे हो सकते हैं?
जीवित होकर भी लाशों की तरह, हम कैसे सो सकते हैं?
उठो! कि अब इस खामोशी को, चीरकर बाहर आना होगा,
मरी हुई इस इंसानियत को, फिर से आज जगाना होगा!
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
Dharmendra kumar Thakur


