रजिस्ट्रेशन के नाम पर सौदा?
सम्मान के बदले भुगतान?
पुरष्कार खरीद रहे हैं आप?
कहाँ है आपका आत्मसम्मान?
काग़ज़ी ट्रॉफियाँ,
खरीदे गए मंच,
मतलबी तारीफ़ों के साथ
गुरु नहीं, ग्राहक खड़े हैं।
शिक्षा के आँगन में,
नकली दीपक जला रहे हैं,
रोशनी कम,
धुआँ ज़्यादा फैला रहे हैं,
सच्चे प्रयासों की शक्ति को
धूमिल करते जाते हैं,
ये दीपक दिशा नहीं दिखाते,
बस आँखें चौंधियाते हैं।
हम ही वो शिक्षक हैं,
जिन्होंने बच्चों को
ईमानदारी का पाठ पढ़ाया,
वो पाठ अब हम भुला रहे हैं।
सम्मान वो होता है
जो माथे पर चमके,
जो दिल को खुशी दे,
जेब पर बोझ ना बने।
सम्मान देना है
तो निःशुल्क दीजिए,
सेवा करनी है
तो शर्त मत रखिए,
क्योंकि गुरु का मूल्य
पैसों से नहीं,
प्रभाव से तय होता है।
आज नहीं बोले
तो कल बच्चे सीखेंगे
कि इज्ज़त खरीदी जाती है।
इसलिए यह केवल विरोध नहीं,
एक संकल्प है
सम्मान के बाजारीकरण को रोकने का।
ओम प्रकाश
म० वि० दोगच्छी, भागलपुर
