कुहासा है घना देखो, जलाने आग अब आओ।
रहे हो कांँपते अबतक, जरा अब तापकर जाओ।।
पता पथ का नहीं चलता, उजाला मिल न पाता है।
चलें अब राह हम कैसे, कदम भी डगमगाता है।।
कहे सूरज अभी सबसे, भला खुद को बचा पाओ।
रहे हो कांँपते अबतक, जरा अब तापकर जाओ।।०१।।
डसेगी नाग बनकरके, अभी बाहर बहुत खतरा।
छुपे रहना घरों में ही, नहीं अच्छा अभी नखरा।।
रहोगे तुम सलामत भी, जरा अब आग जलवाओ।
रहे हो कांँपते अबतक, जरा अब तापकर जाओ।।०२।।
लहर अब शीत का तुमको, कभी भी छू नहीं सकती।
बगावत आग से करके, तुम्हें कुछ मिल नहीं सकती।।
जरा सा पास में बैठो, अँगीठी बस जला लाओ।
रहे हो कांँपते अबतक, जरा अब तापकर जाओ।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
प्राथमिक विद्यालय कालीगंज उत्तर टोला
बिहटा, पटना, बिहार।
संपर्क – 9835232978
