।। तुम हो मेरी रागिनी सी ।। तुम्हारी बोली जैसे मीठी रागिनी सी, अंधेरी रातों में हो तुम मेरी चाँदनी सी।। मैं चकोर, तुम हो पूनम की रात, जैसे मैं…
Category: बाल कविता
*चलें स्कूल*
चलें स्कूल हम हैं सृजन के फूल, चलें स्कूल। चलें स्कूल, चलें स्कूल।। बच्चे हैं हम, सृजन के हार, हमसे ही आती, है बहार। मिल जाये जवाब, हमें…
अभी खेलने के दिन अपने-मनु कुमारी
जी भरकर अभी खेल न पाई सखियों के संग मैया, मेरे ब्याहन की खातिर क्यों बेच रही तू गैया। अपने हक़ का लाड़-प्यार मुझको री मैया दे दो, शादी की…
बचपन
बचपन ना ही किसी की फिक्र है, ना ही किसी का जिक्र हैं, करते हरदम अपने मन की, यही उमर हैं बचपन की। तुरंत रूठना तुरंत मान जाना, लड़ना झगड़ना…
कविता *बाल मनुहार*
बाल मनुहार मां यह मुझे बता दे! आसमान क्यों है नीला कैसे उड़ लेती है चिड़ियां इस नील गगन में ऊपर झरनों में आता जल किधर…
सर्द हवा-राम किशोर पाठक
सर्द हवाओं का झोंका है। अम्मा ने मुझको रोका है।। कहती बाहर में खतरा है। सर्दी का पग-पग पहरा है।। देखो छाया घना कोहरा। सूरज का छिप गया चेहरा।। बूँद…
बाल मनुहार..अमृता कुमारी
*बाल मनुहार* मां यह मुझे बता दे!आसमान क्यों है नीला कैसे उड़ लेती है चिड़ियां इस नील गगन में ऊपर झरनों में आता जल किधर से जो बहती है कल…
मुझको कान्हा आज बनाओ -राम किशोर पाठक
अम्मा कुछ मुझको बतलाओ। मुझको कान्हा आज बनाओ। जो चाहूँ वह दे दो मुझको। ऐसे कभी नहीं तड़पाओ।। मैं भी मुरली बजा सकूँगा। मुरली तो मुझको दिलवाओ।। साँपों का फन…
बाल कविता – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
होकर मगन गगन के नीचे, दौड़ रहे ये बच्चे हैं। जिन्हें देखकर वयोवृद्ध सब,अंतर मन से नच्चे हैं।। हरियाली के बीच निरंतर,कोयल की मीठी बोली, विहग सरीखे उड़ते जो हैं,डाल…
फिर क्यों करती है माँ हल्ला-राम किशोर पाठक
कहती अम्मा मुझको लल्ला। फिर क्यों करती है माँ हल्ला।। कान्हा थें कितना ही नटखट। माखन मिसरी खाते चटपट।। घूमा करते सदा निठल्ला।। फिर क्यों करती है माँ हल्ला।।०१।। फिर…