प्रभाती पुष्प
सीता स्वयंवर
जनक दुलारी सीता,
साध्वी परम पुनीता,
दुल्हन बन कर अवधपुरी आई है।
धनुष जो हुआ भंग,
देख लोग हुए दंग,
घर-घर मिथिला में, बजी शहनाई है।
खुश हुए नर-नारी,
उमंग में प्रजा सारी,
राम जी की सीता संग, हो गई सगाई है।
मुदित हैं राजा-रानी,
अंँखियों में भरा पानी,
सीता जैसी पुत्री मिली, राम सा जमाई है।
जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’
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