कहर-रामपाल प्रसाद सिंह “अनजान”

RAMPAL SINGH ANJAN

गजब शीत काया।

बदन काट खाया।।

अब कहाॅं सवेरा?।

अरुण का बसेरा।।

कनकनी चढ़ी है।

थरथरी बढ़ी है।।

सुबह शाम कैसा!

लहर एक जैसा।।

पिक निवास सोई।

मधुर प्रीति खोई।।

न”अनजान”जागे।

बहर चंद दागे।।

सुन रहा बड़ाई।

घर पड़ी रजाई।।

कर गई दगाई।

बन गई कसाई।।

धुॅंध उठान जारी।

शहर गाॅंव भारी।।

सब पड़े हुए हैं।

सब अड़े हुए हैं।।

कफन काॅंपता है।

बदन ढाॅंकता है।।

कहर और जारी।

अधिक अग्नि प्यारी।।

????ये क्या????????

वसन ही नहीं हैं।

तन ढके वहीं हैं।।

विषम बीच नागा।

जगत बीच जागा।।

रामपाल प्रसाद सिंह “अनजान”

मध्य विद्यालय दरवेभदौर 

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