अष्टांग हृदयम अमृत धारा,
आयुर्वेद का दिव्य सितारा।
ऋषियों का अनुपम यह ज्ञान,
जीवन देता नव सम्मान।
दिनचर्या का सुंदर मर्म,
स्वस्थ रखे तन-मन का धर्म।
ब्रह्ममुहूर्त जागो प्यारे,
जीवन होंगे सुख के तारे।
उषापान का नियम महान,
शुद्ध रहे तन, निर्मल प्राण।
योग-प्राणायाम अपनाओ,
रोगों को दूर भगाओ।
सादा भोजन, सात्विक थाली,
यही है जीवन की खुशहाली।
ताज़ा अन्न और शुद्ध विचार,
यही स्वास्थ्य का सच्चा द्वार।
धीरे-धीरे भोजन करना,
कृतज्ञ भाव हृदय में भरना।
अधिक भोजन रोग बढ़ाए,
संयम जीवन सुख पहुँचाए।
ऋतुचर्या का मान रखो,
प्रकृति संग पहचान रखो।
गर्मी, वर्षा, शीत के संग,
बदले भोजन, बदले ढंग।
त्रिदोषों का अद्भुत ज्ञान,
वात-पित्त-कफ की पहचान।
संतुलन में जीवन खिलता,
असंतुलन रोगों में मिलता।
औषधि केवल वन में नहीं,
रसोई घर से बढ़कर कहीं।
हल्दी, तुलसी, नीम महान,
देते जीवन को वरदान।
क्रोध, चिंता, लोभ त्यागो,
मन में प्रेम का दीप जगाओ।
शुद्ध विचार और मधुर वाणी,
यही सच्ची जीवन कहानी।
राजीव दीक्षित ने समझाया,
भारत का विज्ञान जगाया।
देसी जीवन, देसी खान,
यही भारत की सच्ची शान।
मिट्टी, गौ, गंगा का मान,
इनसे जुड़ा भारत महान।
प्राकृतिक जीवन जो जीता,
वही स्वस्थ आनंदित दीखा।
अष्टांग हृदयम कहता है,
प्रकृति ही जीवन रहता है।
जो आयुर्वेद को अपनाए,
सुख-शांति का फल वह पाए।
आओ मिलकर शपथ उठाएँ,
भारत का गौरव लौटाएँ।
ऋषियों का विज्ञान महान,
बन जाए जन-जन की पहचान।
कार्तिक कुमार MA इन योगा

