पद्यपंकज sandeshparak,Shakshanik,Womens day नारी की व्यथा-लवली कुमारी

नारी की व्यथा-लवली कुमारी


Lovely

खिड़की से झांक कर देखना 

सहमी ,सकुचाई सी खड़ी रहना

 दरवाजे पर आहट आते ही 

मन घबरा जाता 

आखिर कब तक 

आखिर कब तक 

यूं छुप -छुप कर रहना 

 अकेली न बाहर जाना

 जमाने की तानों से 

विचलित हो जाना 

मन विकल हो उठता 

आखिर कब तक 

आखिर कब तक

घर ही बन गया कारागार

 कैद हो गई थी 

जहां मेरे सपने हजार 

पढ़ाई की दुनिया छोड़

 चूल्हा- चौकी में घिस गया 

मेरा कण -कण 

मन बेचैन हो जाता 

आखिर कब तक

 आखिर कब तक 

उड़ना है मुझे भी 

आसमान में 

हमें भी है 

खुल कर जीना 

स्वयं की सम्मान 

की खातिर किससे

 मांगू भीख

धैर्य का बांध

 धूमिल हो जाता

 आखिर कब तक 

आखिर कब तक 

 है नारी!उठ जाग

ये है तेरे 

अंदर की आवाज 

खुद में छिपी

 ताकत को पहचान 

जमाने की तानों

 को हथियार बना 

डरना नहीं 

लड़ना सीख 

तोड़ दे सारी बंदिशे

 करनी होगी स्वयं ही

 तुझे अपनी आत्मरक्षा

 दुनिया के दरिंदों को

 जलाकर भस्म कर

 तब तक जब तक

 खत्म ना हो जाए

 यह सारे भक्षक 

लवली कुमारी

 उत्क्रमित मध्य विद्यालय अनुपनगर

बारसोई कटिहार

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