दोहा रचना कीजिए – एक प्रयास
दोहा रचना जब करें, रखिए इतना ध्यान।
मात्रा गिनती स्वर सभी, व्यंजन का न विधान।।०१।।
गुरु स्वर की मात्रा सदा, गिनना दो है भार।
लघु प्रयोग होता जहाँ, वजन एक स्वीकार।।०२।।
जहाँ संयुक्त वर्ण हैं, अक्षर अर्ध विसार।
अर्ध वर्ण के पूर्व में, होता गुरु का भार।।०३।।
चार चरण में लिख रहे, दोहा सोच विचार।
सम चरणों में हो सदा, तुकांतता स्वीकार।।०४।।
विषम चरण का भार है, होता तेरह जान।
सम चरणों में है सदा, रखना ग्यारह ध्यान।।०५।।
करें पंचकल से नहीं, चरण कभी प्रारंभ।
जगण मान्य होता नहीं, दोहा पद आरंभ।।०६।।
ग्यारहवीं मात्रा सदा, रखिए लघु अनिवार्य।
मात्रा जब चौबीसवीं, एक करें स्वीकार्य।।०७।।
पुनरावृत्ति न शब्द की, दोहा करता रास।
गेय छंद इसको कहे, इसका गुण है खास।।०८।।
विषम चरण के अंत में, है लघु गुरु अनिवार्य।
सम का समाप्ति हो सदा, कर विलोम स्वीकार्य।।०९।।
कल संयोजन संग में, कथ्य शिल्प सह भाव।
सदा गेयता ध्यान रख, लिखिए दोहा चाव।।१०।।
रचयिता:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना।
संपर्क – 9835232978
