शुभ भोर -रामपाल प्रसाद सिंह

शुभ भोर हो गया उजियारा।
मनमोर नाचता है प्यारा।।
“अनजान”साॅंस भरपूर लिए।
अनमोल ज्ञान भरपूर दिए।।

खग जाग भाग कर गगन छुए।
पशु दौड़ भाग कर मगन हुए।।
कितना लहलह नभ भाल अरुण।
कितना महमह खग बाल तरुण।।

ऋषि देख गगन को नाच रहें
उपदेश मगन हो वाॅंच रहें।।
चल निकल चलें ब्राह्मीवेला।
फिर देख ब्रह्म अद्भुत खेला।।

निकलें हम इसका भोग करें।
चलकर फिरकर कुछ योग करें।।
जो देर समय उठ जाते हैं।
पत्थर पर बीज उगाते हैं।।

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
पूर्व प्र०म०विद्यालय दर्वेभदौर
सुप्रभात ओम नमः शिवाय

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