बिहार दिवस।
हरि गीतिका छंद में।
रुकता नहीं बढ़ता सदा रथ,नव नवीन बिहार है।
जो पूर्व-उत्तर में अवस्थित,देश का श्रृंगार है।।
उत्तर-दिशा में है हिमालय,मध्य गंगा बह रही।
मौरंग से आती हवा सुख,लूटने को कह रही।।
हम मार्च की बाईस तिथि में,गा रहे यशगान को।
जन-बोलियाॅं भाषा निरंतर,भा रही भगवान को।।
आशीष पाकर पूर्वजों से,धन्य है मेरी धरा।
हर संपदा से है लबालब,स्वर्ण-सा बिल्कुल खरा।।
हर लोग तो परिचित यहाॅं है,भोजपुर के गान से।
है मैथिली भाषा पुरानी,आज जिंदा शान से।।
मगही हमारी अंगिका भी,दूर तक रखतीं धमक।
है बज्जिका भाषा नहीं कम,देश में रखती चमक।।
विद्वान विद्यापति सुधर्मी,धन्य मिथिला कर गए।
पश्चात वात्सायन कलम से,कामसूत्र निखर गए।।
विज्ञान में हम आर्यभट्टीय,ग्रंथ से सुख पा रहे।
शुभ शून्य को स्वीकारते मम,शीश झुकते जा रहे।।
बक्सर पधारे संत विश्वामित्र सहचर राम थे।
सीतामढ़ी में पल रही थी,जानकी शुभ नाम थे।।
चंपापुरी में कर्ण जैसा,वीर योद्धा थे यहाॅं।
वचसा लिए मस्तक कटाए,नाम ऐसा है कहाॅं।।
इतिहास पन्ने हम पलट कर, हो रहे हैरान हैं।
कितने महामानव पधारे,देख विस्मितमान हैं।।
भूखंड उर्वर मिल गया है,सब्ज धरती की कड़ी।
नदियाॅं कईं फुफकारती भर,अन्न लेकर है खड़ी।
शिक्षा हमारी है पुरानी,विश्व में सम्मान है।
विक्रमशिला का ज्ञान व्यापक,दे रहा विज्ञान है।।
था गर्व नालंदा हमारा,केंद्र शिक्षा का कभी।
आक्रांत जब से हो गया है,मौन हमवासी सभी।।
चाणक्य दर्पण नीतियों की,आज भी पहचान है।
सम्राट में नामी अशोका,श्रेष्ठतम प्रतिमान है।।
अवदान साहित्यिक समाहित,बुद्ध के गुणगान से।
पहचान वैशाली कराती, वर्धमान महान से।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’।
सेवानिवृत शिक्षक
मध्य विद्यालय दरवेभदौर
