मैं संविधान हूं – आंचल शरण

“मैं संविधान हूं”

मैं भारत का संविधान हूं,
महज़ एक किताब नहीं,
गहन करो तो अधिकार हूं
मैं भारत का संविधान हूं।
इसमें केवल शब्द नहीं
भारतीयों की तकदीर हूं
मैं भारत का संविधान हूं।
करता हूं बात मैं समानता की
जात पात धर्म की गिरता हुआ दीवार हूं।
मैं भारत का संविधान हूं।
भेद भाव ऊंच नीच कोई नहीं
मैं स्त्रियों का सम्मान हूं
मैं भारत का संविधान हूं।
राजा हो या रंक यहां
सभी यहां समान है।
मैं भारत का संविधान हूं
बेशक रहता हूं मौन मैं
ललकार अगर अपराध को
धरता रूप प्रचंड हूं
मैं भारत का संविधान हूं।
न कोई अशिक्षित रहे न कोई शोषण करे
ऐसा मै अधिकार हूं
मैं भारत का संविधान हूं।
प्रभुता,एकता ,अखंडता
राष्ट्र की पहचान हूं
मैं भारत का संविधान हूं
मैं महज़ किताब नहीं,
ज्ञान, समर्पण, विश्वास हूं।
मैं भारत का संविधान हूं।
विद्वानों की सोच हूं बाबा की रचना हूं,न्यायालय का न्याय हूं।
मैं भारत का संविधान हूं।

— आंचल शरण
म. वि. बरेटा संथाल, कसबा पूर्णिया

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