क्षितिज लालिमा की झलक,संपूरित उल्लास।
नभचर थलचर चेतना,भरतीं हैं हुल्लास।।
सारी सृष्टि सजी-धजी,निकलेगी बारात।
गाजे-बाजे में खिले,दानव-मानव जात।।
जय-जय हे शिव-पार्वती,मिटें दिलों की स्याह।
उन्मत उत्सव दिव्यता,दिखा रही शुभ राह।।
प्रेम-त्याग सम मेल से,होगी धरा सनाथ।
खींची धर्म लकीर की,हम सब होंगे साथ।।
तट द्वि खड़े हैं शिव-शिवा,मध्यम परमाधार।
सागर सुलभ ढलान पर, तत्वज्ञान विस्तार l l
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
अवकाश प्राप्त
मध्य विद्यालय दर्वेभदौर
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