होली -डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या

होली
सारे शिकवे गिले एकदम छोड़ दें।
आज होली के रंग में शहद ऊघोल दे ,
इक पिचकारी लें तन व मन बोर दे।

आज होली के रंग में शहद घोल दे ,
इक पिचकारी लें तन व मन बोर दे।

दर्द के राह के भी सपन छोड़ दें,
कल नहीं आज हम, आज हम छोड़ दे।
प्रेम इस अंग दे, प्रेम उस अंग लें,
आज होली में हम अंतरंग रंग दे।

आज होली के रंग में शहद घोल दे ,
इक पिचकारी लें तन व मन बोर दे।

होली ऐसी मने न रहे कोई ग़म,
रंग से रंग देना है तन मन बदन।
हर गली में चले है जो कान्हा किशन ,
इनकी पिचकारी, में प्रेम रंग घोल दें।

आज होली के रंग में शहद घोल दे ,
इक पिचकारी लें तन व मन बोर दे।

इस अवध में सियाराम खेलें होली,
बरसाना बनी हैं नगर की गली ।
कान्हा को मोर संग भंग अंग जोड़ दे,
गंगा यमुना सा पावन ये मन जोड़ दें।

आज होली के रंग में शहद घोल दे,
इक पिचकारी लें तन व मन बोर दे।

डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या
उत्क्रमित कन्या मध्य विद्यालय शरीफगंज कटिहार

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