Tag: देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

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दोहा – देव कांत मिश्र ‘दिव्य’दोहा – देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 10:24 pm

रिश्ता हो कायम सदा, भरते रहें मिठास। अपनेपन का भाव रख, करिए सुखद उजास।। ईश-याचना नित करें, रखें न कपट[...]

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दोहा – देव कांत मिश्र ‘दिव्य’दोहा – देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 10:22 pm

भूप जनक के बाग में, आए राजकुमार। दिव्य मनोहर वृक्ष से, मुग्ध नयन अभिसार।। नव किसलय नव पुष्प से, हर्षित[...]

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कुंडलिया- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’कुंडलिया- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 6:15 pm

माता की आराधना, करो सदा प्रणिपात। अंतर्मन के भाव में, भरो नहीं आघात।। भरो नहीं आघात, कर्म को सुंदर करना।[...]

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Devkant Mishar

मनहरण घनाक्षरी- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’मनहरण घनाक्षरी- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 6:17 pm

वृक्ष पुत्र के समान, रखें सभी नित्य ध्यान, शुद्ध वायु प्राप्त होती, बड़े-बड़े काम हैं। पत्ते हैं गुणकारक, छाया तो[...]

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मनहरण घनाक्षरी – देव कांत मिश्र ‘दिव्य’मनहरण घनाक्षरी – देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 7:28 am

शाक्य वंश जन्म लिए, सत्य धर्म भाव किए, तथागत बुद्ध हुए, कृतियाँ महान हैं। राजपाट त्याग कर, मूल कर्म झोली[...]

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पावन होली आई है- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’पावन होली आई है- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 9:46 pm

विधा: गीत(१६-१४) आओ स्नेहिल रंग उड़ाओ, पावन होली आई है। बच्चे बूढ़े नर- नारी पर, कैसी मस्ती छाई है।। सुंदर[...]

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मनहरण घनाक्षरी- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’मनहरण घनाक्षरी- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 6:51 pm

विधा: मनहरण घनाक्षरी राष्ट्र के हैं दिव्य लाल, सौम्य तन उच्च भाल, ज्ञान बुद्धि प्रेम के वे, निर्मल स्वरूप हैं।[...]

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दोहा- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’दोहा- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 8:35 pm

विधा: दोहा रचनाकार: देव कांत मिश्र ‘दिव्य’ “”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””” नित्य सुबह जगकर करें, हम ईश्वर का ध्यान। जिनकी महिमा है अमित,[...]

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प्यारा गाँव- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’प्यारा गाँव- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 8:30 pm

सबसे प्यारा गाँव हमारा, अद्भुत सुंदर न्यारा है। चलो तुम्हें हम आज दिखाएँ, उर का भाव हमारा है।। होती अनुपम[...]

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मैं भारत ज्ञान प्रदाता हूँ- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’मैं भारत ज्ञान प्रदाता हूँ- देव कांत मिश्र ‘दिव्य’

0 Comments 8:54 pm

मैं भारत, ज्ञान प्रदाता हूँ। प्रज्ञा की ज्योति जलाता हूँ।। अपनी संस्कृति, सबसे सुंदर, यह जन-जन को बतलाता हूँ। मैं[...]

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