पद्यपंकज sandeshparak,Shakshanik विजय पताका-बिंदु अग्रवाल

विजय पताका-बिंदु अग्रवाल

मेहनत करने वालों को
मिलती मंज़िल की राहें।
मंज़िल स्वागत-गान करे,
फैलाकर अपनी बाँहें।

जिसने अपना बना पसीना,
लहू बहाया होगा,
उसने बंजर धरती पर भी,
फूल खिलाया होगा।

जिसने लोगों के तानों की
परवाह कभी न की हो,
जिसने खुद के ही दम पर
परवाज़ हमेशा की हो।

जिसके पास साहस और श्रम हो,
मंज़िल उसको अपनाती है।
विजय-पताका सदा हाथ में ,
उसके लहराती है।

बिंदु अग्रवाल
शिक्षिका मध्य विद्यालय गलगलिया

किशनगंज बिहार

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