सृष्टि के निर्माण में
जो साझेदारी कर सकती है
अपना छोड़
जो सबकी हितकारी बन सकती है
जो हंसकर
अपमान भरे विष प्याला भी पी सकती है
हर चुनौती का सामना
डटकर नारी भी कर सकती है
देखो हमें कम ना आंकना,
हम हर नामुमकिन को भी
मुमकिन कर सकती हैं
कहां कहां आजमाओगे हमें,
हम हर रूप में
अस्तित्व हमारा गढ़ सकती हैं
और हो पुरुष तुम, सुनो
है हमारा सृष्टि में योगदान बराबर
फिर नारी को कदम कदम पर
“प्रहरी” की है क्यों जरूरत….?
ना कोई दिवस दो हमें
ना एक दिन की दो शुभकामनाएं…….
दो हमें अपनी बराबरी का स्थान
हमें भी दो मान और सम्मान
पैरों में बेड़ियां बांधकर
आजादी ना दो…..
अपनी मर्यादा तुम निभाओ
मैं भी अपने संस्कार निभाऊं
जब कदम कभी थक जाए तो
साथ खड़े अपने, तुम्हें पाऊं …..।
मधु कुमारी
प्रधान शिक्षक
प्रा० वि० बंधकट्टा
कटिहार
