भाग गया है शीत,निकल कर देखो।
बाहर किरणें प्रीत,निकल कर देखो।।
जो था कल तक ठोस,पिघलते देखो।
बूॅंदें अटकीं ढीठ, चमकते देखो।।
सोनू मोनू दौड़,लगा कर आओ।
हवा फेफड़ा फेंक,स्वस्थ हो जाओ।।
ग्रीवा कंचन हार,उसे अब फेंको।
सर्षप सचमुच पीत,मन भर देखो।।
कागज ऊपर छाप,हृदय कर पीला।
जाओ कुछ दिन भूल,गगन है नीला।।
सुख का ही तो हाट, चतुर्दिक फैला।
मांजर मंजुल ढेर,भरा हर थैला।।
सुधीजनों के पास,बैठ मत चीखो।
कहते हैं “अनजान”,पढ़ो कुछ सीखो।।
भरे हुए भंडार,समय पर लूटो।
राग-द्वेष बेकार,मानकर कूटो।।
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रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
अवकाश प्राप्त
मध्य विद्यालय दर्वेभदौर
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