श्रीकृष्ण कहते, तुझमें शक्ति है, तू परंतप, महाबाहो, महावीर है,
तू पार्थ, ईश्वर का पवित्र अंश, गुडाकेश, साहसी, परम धीर है,
कर्तापन का अभिमान छोड़, मेरे कार्यों में निमित्तमात्र बनता चल,
अपना कर्त्तव्य निष्ठा से करता चल, तू निरंतर यश प्राप्त करता चल,
तुम अपने कर्त्तव्य-मार्ग पर अपकीर्ति से डरता चल, यश को प्राप्त करता चल,
अन्तरात्मा से निरंतर मुझे भजता चल, तू सत्कर्म, कर्त्तव्य करता चल,
ईश्वर में आस्था रख आत्मभाव में स्थित हो नदी-सा तू बहता चल,
दृढ़निश्चयी, स्थितप्रज्ञ होकर निरंतर तू अपना कर्त्तव्य करता चल,
सर्दी-गर्मी, सुख-दुख को तू सहता चल, तू अपना कर्त्तव्य करता चल,
नित नवीन बने रहकर दायित्व उठा, सभी दायित्वों को पूर्ण करता चल,
सबमें समान भाव रख, प्रत्युपकार की आशा किये बिना सतत उपकार करता चल,
अपने जीवन को सही दिशा में ले चल हरदम, उच्च ध्येय को प्राप्त करता चल,
ईश्वर में आस्था रख, कर्म और ज्ञान को साथ लेकर जीवन को अर्थपूर्ण करता चल,
सतत ज्ञान प्राप्त कर, अर्थपूर्ण कार्य कर, निरंतर प्रगति-पथ पर बढ़ता चल
गिरीन्द्र मोहन झा
