मधुमास ने जब धीरे से आँचल फैलाया,
वसंत ने धरती को दुल्हन-सा सजाया।
सौंदर्य झुका पत्तों की हरित पलकों में,
लावण्य चमक उठा ,ओस की झिलमिल छलकों में।
डाल-डाल पर मंजरी ने नयनों से बोला,
कलिका शरमाकर अधरों पर हँस डोला।
पवन ने छूकर कुछ यूँ सरगोशी की,
तन-मन में मीठी-सी थरथर सी उठी।
सौरभ ने चुपके से साँसों को थामा,
सुगंध ने हर पल को स्वप्न सा बनाया।
नदियाँ लहराकर कंगन खनकाती रहीं,
धरती साजन के पथ को निहारती रही।
पक्षी बने गीत, दिशाएँ बनीं धुन,
सूरज ने प्रेम से चूमा हर एक कण।
प्रकृति सजी, लजी, मुसकाती बोली—
मधुमास है यह, प्रेम की बेला होली।
स्वरचित एवं मौलिक
मनु कुमारी
विशिष्ट शिक्षिका
प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी
राघोपुर,सुपौल
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