पद्यपंकज Deshbhakti,sandeshparak,Shakshanik महात्मा गांधी जयंती – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

महात्मा गांधी जयंती – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

दो अक्टूबर दिवस अनोखा,आया है शुभ वार।

नभ से दिव्य पुरुष हैं उतरे,फैलाए संस्कार।।

जिनका बचपन अनुशासित था,पाए हम उपहार।

प्रेरक उनकी जीवन गाथा,स्वीकारें आभार।।

सत्यवाद के पोषक गांधी, खोली निर्भय राह।

हिमालय ने शीश झुकाया, देखी जोश प्रवाह।।

कार्य असंभव संभव करने, उन्मादित सब लोग।

देश हितैषी बापू त्यागे, सुख-वैभव का भोग।।

भारत माता के पैरों में, पड़ी हुई जंजीर।

सर्वघटित घटनाएँ घातक, हृदय चुभाती पीर।।

ठान लिये थे वीर अहिंसक,पूर्ण चाहिए न्याय।

हे अंग्रेजों!लाँघ सिंधु को,जा वापस निरुपाय।।

स्वस्थ लेखनी बोली उनकी,सहन नहीं अन्याय।

त्याग वकीली शुभ संकल्पन,शासन के प्रति हाय।।

विषम काल में शीश कटाने,लाखों जन आबाद।

उनकी अगुवाई में निर्भय,वैरी से संवाद।।

विवश फिरंगी को थर्राए,गाँधी की हुंकार। 

सागर झूम रहे नभ नीचे,मांग उठे अधिकार।।

महापुरुष हैं परम यशस्वी,दुनिया में है नाम।

कार्य कुशल चरम चारित्र्य, कभी नहीं विश्राम।।

हे दिनकर!अब देख रहा क्या,उनके पीछे घूम।

थे कर्तव्य परायण निर्भय,लेखन उनकी चूम।।

राज घाट पर चलकर देखो,लगी बड़ी है भीड़। 

पंछी ऐसा मिला नहीं फिर,केवल रीता नीड़।

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

0 Likes
Spread the love

Leave a Reply