मैं डुबोया है मुझे ही भँवर में।
हो अकेला रह गया मैं शहर में।।
है फिकर किसको यहाँ दूसरे की।
स्वार्थ बस रहता यहाँ हर नजर में।।
खास हूँ का भ्रम लिए उम्र भर मैं।
ठोकरें खाता रहा हर डगर में।।
सुर्खियों में था कभी गर्व से मैं।
आज दिखता भी नहीं मैं खबर में।।
खो दिया पहचान मैं आज अपना।
बन गया अनजान खुद के नगर में।।
काटता अब जिंदगी मैं अकेला।
साथ कोई है नहीं अब सफर में।।
जीत लेना मैं यहाँ वीरता है।
जीतता भी है वही भव समर में।।
रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क- ९८३५२३२९७८

