शीर्षक:- पुरवाई आई,गर्मी घबराई।
पछुआ पवन पाँव,रौंद दिया गाँव-गाँव,
बढ़ गया काँव-काँव ,चैन नहीं छाँव में ।
प्रभु ने लिखा है लेख,फटती दरार देख,
कैसी सर-भाग्य-रेख ?, लिखी ठाँव-ठाँव में।
पुरवाई सागर से,मिलने को नागर से,
शीतल पवन शीघ्र, घुस आई गाँव में।
संजीवनी रसधार,लौटाए सृष्टि में प्यार,
सुख जो भी पादप थे ,लिपटे हैं पाँव में।
कर गयी पुरवाई,हरजाई की विदाई,
सर-सर हवा बोली ,चहुँओर राह में ।
बाँहों को फैलाए हुए, धरा पर छाए हुए,
गर्मी के घाव फोले , बह गए आह में।
होने लगी हैं बौछार,गाने लगे हैं मल्हार,
नेपथ्य को भूलकर, बर्षा ऋतु माह में ।
बदल गई है भाषा,सामने खड़ी है आशा,
किसान के कांँधे उठे , आज वाह-वाह में।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

