मानवता जो जीवित मन में, उत्तम हर व्यवहार।
भरा रहे मन खुशियों से, हर जीवों से प्यार।।
सरल नहीं है मानव रहना, जिस मन रहता क्रोध।
नहीं समस्या जबतक खुद पर, मिलता है कब बोध।।
अमल हमें ही करना होगा, रखकर समता सार।
मानवता जो जीवित मन में, उत्तम हर व्यवहार।।०१।।
बस इतना सा ध्यान रखें हम, सरल लगे हर राह।
कर्म हमें वैसा ही करना, जो औरों से चाह।।
है विकास की गाथा लिखना, सबका ही अधिकार।
मानवता जो जीवित मन में, उत्तम हर व्यवहार।।०२।।
सद्गुरु संगति ग्रहण करे जो, पाए नवल विहान।
धर्म-कर्म पर चले निरंतर, दे औरों को मान।।
निर्मल मन जब हो जाए तो, हो मानव उद्धार।
मानवता जो जीवित मन में, उत्तम हर व्यवहार।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – 9835232978
