खत – विधाता छंद
रखा खत में कभी मैंने, हृदय को खोलकर अपना।
लिखा कुछ शब्द जो मैंने, वही तो खास था सपना।।
मगर जिसको लिखा मैंने, उसे दे तक नहीं पाया।
रखा हर स्वप्न को यूँ ही, सफलता छोड़ मुस्काया।।०१
जमाना आज है बदला, मगर उनके निगाहों में।
दिखा मुझको वही मंजर, चले आएँ पनाहों में।।
हुआ गुस्सा बहुत मुझको, अजी किसको सुनाऊँ मैं।
पिया विष का कभी प्याला, अरे किसको बताऊँ मैं।।०२
वही है आखिरी खत जो, दिलाता याद है उसका।
नहीं टूटने दिया मुझको, दिखाकर प्यार है उसका।।
लहू सा आज भी लगता, लिखा हर शब्द स्याही से।
डरा जो रह गया अबतक, सदा कल्पित मनाही से।।०३
अभी भी है वही पीड़ा, सहा जो खत नहीं देकर।
मगर अब भ्रम मिटा सारा, रहा दुविधा जिसे लेकर।।
अभी तक खत रखा मैंने, छुपाकर आलमारी में।
पढ़ा करता उसे खुद ही, सदा अपनी खुमारी में।।०४
रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क- 9835232978
