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करे जब पग स्वयम् नर्तन,
समझ लेना कि होली है
रग-रग में फूट पड़े स्पंदन,
समझ लेना कि होली है।
वायु में उन्मुक्त पराग सा
जब माधुर्य बिखरने लगे,
स्मृतियों के श्वेत कपोलों पर
गुलाल का अनुराग उतरने लगे,
और अंतरतम की वीणा से
अदृश्य कोई धुन झरने लगे,
हिलोरें लेने लगे जब मन
समझ लेना कि होली है।
जब मन की जर्जर दीवारों पर
उल्लासित अभिनव दीप्ति झरे,
जब संकोचों के शुष्क उपवन में
राग-रसाल का नव पुष्प खिले,
और चित्ताकाश में अनायास ही
रंगों का मेघ मँडराने लगे,
भींग जाने को व्याकुल तन
समझ लेना कि होली है।
जब कटुता की कालिमा धुलकर
करुणा का कुसुम प्रस्फुटित हो,
अहंकार के कठोर शिला पर
स्नेह का सलिल संचित हो,
और विभेदों के कंटक पर
समरसता का ही बस रस हो,
जन गण मसलें समता चन्दन
समझ लेना कि होली है।
जब नेत्रों में नव प्रभात जगे,
अधरों पर निष्कपट हास खिले,
जीवन की निर्जन वीथिका में
सहसा उत्सव का रथ आ पहुँचे,
और पग-पग पर आत्मा स्वयं
आनंद-अभिषिक्त हो झूम उठे,
उल्लसित लगे कण-कण
समझ लेना कि होली है।
बिना तिथि, बिना पंचांग
समझ लेना कि होली है।
ओम प्रकाश
भागलपुर

