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शारीरिक ढांचा नारी का, पर भीतर तेज पुरानी है,
विजयादशमी का पर्व कहे, वह साक्षात भवानी है।
दिखते नहीं हैं दस हाथ उसके, संसार की इस माया में,
पर दस हाथों का काम छुपा, उसकी कोमल सी काया में।
एक हाथ से चूल्हा-चौका, दूजे से दफ्तर सँभाले,
तीजे से बच्चों को सींचे, चौथे से जग को उजाले।
पाँचवे से वह धीर बंधाए, छठे से संकट को टाले,
सातवें से मर्यादा रचे, आठवें से हर शंका मिटा दे।
नौवें से खुशियाँ बिखराए, दसवें से वह ढाल बने,
वही लक्ष्मी, वही सरस्वती, वक़्त पड़े तो काल बने।
ममता की वह मूरत ऐसी, जिसका कोई मोल नहीं,
अमृत जैसा स्नेह है उसका, जिसका कोई तोल नहीं।
सहनशीलता की देवी है, वह चुप रहकर सब सहती है,
तप को अपने आभूषण कर, वह गंगा जैसी बहती है।
वह हार नहीं मानती कभी, हर काम सफलता से करती,
काँटों भरे इस जीवन में, वह धीरज का रंग है भरती।
नमन है ऐसी शक्ति को, जो हर घर को स्वर्ग बनाती है,
बिना दस हाथों के भी जो, माँ दुर्गा सी पूजी जाती है।
बिना दस हाथों के भी जो, माँ दुर्गा सी पूजी जाती है।
वह त्याग की एक प्रतिमूर्ति है, जो खुद को रोज भुलाती है,
औरों के होठों पर हँसी, वो चुपके से रख जाती है।
संकट जब भी घर पर आए, वह बनकर दीवार खड़ी,
कमजोर न समझना नारी को, वह आपदाओं में सबसे बड़ी।
इतिहास गवाह है शक्ति का, उसने ही सृष्टि को पाला है,
उसके ही आँचल की छाँव ने, इस जग को रूप निराला है।
वह केवल नारी नाम नहीं, वह जीवन की परिभाषा है,
निराशा के घोर अँधेरे में, वह किरणमयी एक आशा है।
विजयादशमी का पर्व यही, संदेश हमें दे जाता है,
नारी का सम्मान जहाँ, ईश्वर भी शीश झुकाता है।
वह आदि, अनादि, अनंत रूप, हर युग की अमिट कहानी है,
सृजन और संहार की शक्ति, वह साक्षात भवानी है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

