पंख नहीं हैं मेरे अपने,
पर देखा है ढेरों सपने।
शून्य खड़ा हूँ भूमि पर मैं,
पर छूना है नील गगन को,
रौंद अधूरी अभिलाषा को,
मथना है इस शांत पवन को।
बिन पंखों के उड़ जाऊँगा,
नभ की सीमा लाँघूँगा मैं,
सूरज की तपती ज्वाला से,
अपने भाग्य को माँगूँगा मैं।
ये पर्वत, ये सागर छोटे,
धरा पूरी बौनी लगती है,
मेरी ऊँची परवाज़ के आगे,
काल की गति भी थमती है।
तारों को मुट्ठी में भींचूँ,
चंदा को गले लगाऊँगा,
बिना पंख के इस अंबर में,
अपनी नई एक सृष्टि बनाऊँगा।
रोके से न रुक पाऊँगा मैं,
बाधाएँ सब चूर करूँगा,
सपनों के इस दिव्य वेग से,
ब्रह्मांड को भी पार करूँगा!
मिटा रूप का वह मिथ्या दर्प,
दूर हुआ अंततः सारा संताप,
छूट गया जब नश्वर का मोह,
धुल गए हृदय के संचित पाप।
स्तब्ध खड़ी थी ललित वह रजनी,
शीतल मंद बही फिर पवन,
तपस्वी की उस पावन गोदी में,
वासवदत्ता का तृप्त हुआ मन।
झर पड़े नयन से आँसू दो,
करुणा की अविरल धार बही,
क्षणभंगुर काया झुलस चुकी थी,
पर आत्मा आज मुक्त खड़ी थी।
बोले तब भिक्षु शांत स्वर में—
“नश्वर रूप तो ढल जाता है,
पर जो जीता है करुणा की लौ में,
वह बुद्धत्व को पा जाता है।”
अंधकार की उस गहरी परिखा में,
अद्भुत एक भोर मुसकाई,
त्याग और सेवा के उस मिलन में,
सच्ची मानवता मुस्काई।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

