प्रकृति के पेड़-पौधे हम बेचारे,
हम मानव के बहुत काम आए, आएँगे।
पर मुझे यह अरमान नहीं
कि मानव से हम इसकी
कृति की कृतज्ञता पाएँ।
मानव को श्वसन की चिंता नहीं,
यह चिंता हमें सताती।
कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन
में बदलने की कला हमने अपनाई।
फूल, फल, लकड़ी देते हम उपहार में,
क्या इतना बहुमूल्य कार्य करने के लिए
लेते हम क्या कुछ मनुष्य से उपहार में?
मेरे घने वन, बसेरे उजड़े,
उजड़े मेरे तने।
क्या कभी हम अपनी टहनी से
मनुष्य को घायल करते?
कटती टहनियों से मेरे
पानी जैसे चिपचिपे आँसू बहते,
बस मन में सहकर आँसू पोंछते,
फिर पनपते।
प्रदूषण फैले विभिन्न तरह के,
उसे भी वातावरण को स्वच्छ बनाते।
क्या हम इसके बदले पारितोषिक की
आशा करके क्या मनुष्य के दफ्तर में
कतार लगाते?
ऐसा नहीं है अरमान ! कि किसी से
इतना-सा भी सम्मान पाएँ।
बस इतनी-सी है अरमान !
कि हमें वे अपने पास रहने का अवसर देते,
अपनी माँ के नाम से एक वृक्ष लगाते।
बाग-बगीचे, द्वार पर हम
शुद्ध हवा, छाया देते,
प्रदूषण के इस दुर्गंध में
सुगंधित हवा फैलाते।
हर आत्मा, प्राण का
भरण-पोषण और संतोष देते,
मुस्कान देकर,
खुद भी मुस्काते।
मैं प्राण का पुरस्कार देने वाला,
एक वृक्ष लगाकर देखे,
प्रदूषण के इस दुखित माहौल में
शुद्ध वातावरण बनाकर देखे।
ऐसे हैं अरमान मेरे,!
कि मनुष्य कुंठित क्यों होए?
इस बिगड़ते दृश्य के लिए
दोषी क्यों होए?
उमेश कुमार सिन्हा ‘ निर्देशक’
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
बिहार सरकार द्वारा पूर्णतः स्वीकृत विद्यालय
गोस्वामी तुलसीदास पथ , लालापुल रघुनाथपुर
अंचल – ब्रह्मपुर (श्री ब्रह्मेश्वरनाथ धाम)
जिला – बक्सर

