पद्यपंकज Bhakti राधा रानी का अवतरण :- बाल कृष्ण दर्शन से पहली खिलखिलाहट – उमेश कुमार सिन्हा 

राधा रानी का अवतरण :- बाल कृष्ण दर्शन से पहली खिलखिलाहट – उमेश कुमार सिन्हा 



 कृष्ण-जन्माष्टमी हम मनाते,

कान्हा की महिमा गाते हैं,

पर श्रीराधा के जन्म की कथा,

आज आपको सुनाते हैं।

भाद्रपद कृष्णपक्ष अष्टमी को,

मध्यरात्रि का समय सुहाना था,

कंस के कारागार में कान्हा ने,

जग में जन्म लिया प्यारा था।

वसुदेव जी नंद के गाँव,

कृष्ण को लेकर आए थे,

यशोदा मैया की गोद में,

नंदलाला को सुलाए थे।

पर राधा की लीला न्यारी,

अद्भुत उनका जन्म हुआ,

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को,

प्रेम-सुधा का उद्गम हुआ।

मध्य-दोपहर का समय था,

यमुना का निर्मल था पानी,

सहस्रदल स्वर्णिम कमल पर,

विराजी दिव्य बालिका रानी।

रावल गाँव के समीप यमुना,

महावन की पावन धरती,

स्वर्णिम आभा वाली कन्या,

लगती थी जैसे ज्योति उतरती।

महाराज वृषभानु यमुना में,

स्नान कर बाहर आए थे,

स्वर्णिम कमल को देखकर,

विस्मय में वे ठहर गए थे।

पास गए तो देखा उन्होंने,

कमल पर बालिका मुस्काती,

दिव्य स्वरूप देखकर उनके,

आँखों में खुशियाँ भर जातीं।

यमुना मैया से वृषभानु,

संतान हेतु प्रार्थना करते,

आज वही मनोकामना पूरी,

मानो अपने सामने पाते।

बालिका को लेकर घर आए,

कीर्तिदा मैया हर्षाईं,

लेकिन एक बात थी अद्भुत—

बालिका ने आँख न उठाईं।

न कुछ बोली, न आँखें खोलीं,

न जग की ओर निहारा था,

वृषभानु के मन में आया,

शायद बेटी ने कुछ न देखा था।

तभी वहाँ नारद मुनि आए,

बोले—“चिंता मत कीजिए,

यह बालिका दिव्य स्वरूपा है,

हर्ष से जन्मोत्सव कीजिए।”

फिर रावल में धूम मची थी,

मंगल-गीत सुनाए गए,

सगे-संबंधी, मित्र सभी के,

घर-घर संदेश पहुँचाए गए।

नंद बाबा को भी बुलवाया,

उत्सव में आने का न्योता था,

कृष्ण-बलराम संग यशोदा,

रावल आने का अवसर था।

नन्हे कृष्ण तब बालक थे,

ठुमुक-ठुमुक कर आते थे,

नन्हे पाँवों और हाथों से,

धीरे-धीरे बढ़ते जाते थे।

चलते-चलते कान्हा पहुँचे,

राधा के उस पालने पास,

नन्हे हाथों से पालना पकड़ा,

था मुख पर मधुर उजास।

धीरे से राधा को छूकर,

कान्हा ने जैसे प्रेम जगाया,

उस क्षण जो अद्भुत लीला हुई,

देख सभी ने शीश झुकाया।

राधा ने पहली बार उसी क्षण,

अपने नयन कमल से खोले,

सामने खड़े नंदलाला को,

देख अधरों से हँसकर बोले।

आँखों में था प्रेम अपार,

मुख पर मुस्कान सुहानी थी,

मानो कृष्ण के दर्शन की ही,

राधा ने मन में ठानी थी।

जो बालिका अब तक चुप थी,

नयन न जिसने खोले थे,

कृष्ण को देखते ही उसके,

नयन प्रेम से डोले थे।

सबने देखा अद्भुत दृश्य,

सबके मन भाव-विभोर हुए,

राधा-कृष्ण की दिव्य लीला से,

आँखों के आँसू चोर हुए।

कृष्ण जन्मे कृष्णपक्ष में,

राधा शुक्लपक्ष में आईं,

एक अष्टमी रात्रि में चमकी,

एक अष्टमी दिन में छाई।

एक ओर नंद के नंदन,

एक ओर राधा रानी,

एक बने प्रेम के मोहन,

एक प्रेम की अमर कहानी।

रावल की पावन धरती पर,

आज भी गूँजती कथा है,

राधा-कृष्ण के पावन प्रेम में,

भक्ति की निर्मल धारा है।

बाद में बरसाना बसकर,

राधा की महिमा और बढ़ी,

राधारानी के नाम से उसकी,

पहचान जगत में जा जुड़ी।

कृष्ण बिना राधा अधूरी,

राधा बिना कृष्ण अधूरे,

दोनों के पावन प्रेम से,

भक्तों के जीवन हों पूरे।

राधा केवल नाम नहीं हैं,

राधा प्रेम की पहचान,

कृष्ण-भक्ति की मधुर भावना,

राधा में बसता भगवान।

राधे-राधे नाम पुकारें,

मन में प्रेम जगाएँ हम,

राधा-कृष्ण की पावन लीला,

हर हृदय में बसाएँ हम।

उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक ‘

डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर 

तुलसीपथ लालापुल रघुनाथपुर 

अंचल – ब्रह्मपुर, जिला – बक्सर

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